जाने क्यों ये उम्र मुझे लंबी सी लग रही है,
बताए कोई, क्यों ये तन्हाई मुझे अपनी सी लग रही है।
चलते-चलते मेरे दिल को ये ज़िंदगी ज़रा फीकी सी लग रही है।
फिर से बिखर जाना है, कहीं न कहीं किसी चौराहे पर मुझे,
अपने सपनों को दफ़नाकर, किसी न किसी किनारे पर मुझे।
किसी रोज़ मौत भी दस्तक देगी मेरे दरवाज़े पर,
कहेगी — “चलने का समय सामने है तेरे।”
तब क्या मुझे वो लोग याद आएंगे जिनसे मैंने किसी दौर में मन लगाया था,
या फिर इन बंद होती आंखों के सामने आएंगे वो अधूरे ख़्वाब,
जिनसे मैंने आत्मा लगाई थी?
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